वो हॉस्टल के हसीं पल
आज भी याद आते हैं ||
वो अविनाश का 'पार्टनर' कहना,
वो राहुल का 'जुल्फें' सवारना और मुस्कुराना,
वो मिश्र की 'झंडू बाम','सोने का स्टाइल' और 24 घंटे पढना,
आज भी याद आता है.....
वो उज्जवल का 'बचपना',
वो विभोर की 'गालियाँ',
वो ललित का 'चिल्लाना' और पचौरी का 'इमेजिनेसन',
आज भी याद आता है.....
वो नितिन का 'कांव' करना,
वो विनायक का 'उठाकर दौड़ना'
वो 317 का 'मीटिंग रूम' और 315 का 'प्रताड़ना कक्ष',
आज भी याद आता है.....
वो शाम ७ बजे गर्ल्स हॉस्टल साइड वाले रूम्स की लाइट बंद कर खिड़कियाँ लूटना,
वो शनिवार की रात भर movies देख कर रविवार को पूरा दिन सोना और
सिर्फ खाने के लिए उठना,
आज भी याद आता है.....
वो पचौरी के साथ हॉस्टल की छत पर BME की तैयारी और
'चप्पल-डांडिया' वाली सभी दोस्तों की यारी,
आज भी याद आती है.....
वो डायरी मेन्टेन करना,
रात 2 बजे रैगिंग देना और
सीनियर्स के रूम्स विसिट करके मिनाल में पार्टी लेना,
आज भी याद आता है.....
वो हॉस्टल के फ़ोन से गर्ल्स-हॉस्टल फ़ोन लगाना
वो मेस की टीवी पर क्रिकेट मैच देखना और
मेस में स्ट्राइक होने पर मिनाल जाके खाना
आज भी याद आता है.....
वो दीपक का हर बर्थडे पर पिटना,
वो समीर, नितिन, पियूष का हॉस्टल आना और
वार्डन के आने पर नितिन को सेल्फ पर चढ़ाना
आज भी याद आता है.....
वो ब्रिज को '********' पढ़ाना,
वो मिश्रा को '#### ####' दिखाना और
बँटी का कारनामा
आज भी याद आता है.....
वो रात को देर से आना और
वार्डन को 'Election' की बातों में फंसाना,
वो दोस्तों का तराना,
वो हॉस्टल का अफसाना,
वो साल जो था सुहाना,
आज भी याद आता है.....
आज भी याद आते हैं ||
वो अविनाश का 'पार्टनर' कहना,
वो राहुल का 'जुल्फें' सवारना और मुस्कुराना,
वो मिश्र की 'झंडू बाम','सोने का स्टाइल' और 24 घंटे पढना,
आज भी याद आता है.....
वो उज्जवल का 'बचपना',
वो विभोर की 'गालियाँ',
वो ललित का 'चिल्लाना' और पचौरी का 'इमेजिनेसन',
आज भी याद आता है.....
वो नितिन का 'कांव' करना,
वो विनायक का 'उठाकर दौड़ना'
वो 317 का 'मीटिंग रूम' और 315 का 'प्रताड़ना कक्ष',
आज भी याद आता है.....
वो शाम ७ बजे गर्ल्स हॉस्टल साइड वाले रूम्स की लाइट बंद कर खिड़कियाँ लूटना,
वो शनिवार की रात भर movies देख कर रविवार को पूरा दिन सोना और
सिर्फ खाने के लिए उठना,
आज भी याद आता है.....
वो पचौरी के साथ हॉस्टल की छत पर BME की तैयारी और
'चप्पल-डांडिया' वाली सभी दोस्तों की यारी,
आज भी याद आती है.....
वो डायरी मेन्टेन करना,
रात 2 बजे रैगिंग देना और
सीनियर्स के रूम्स विसिट करके मिनाल में पार्टी लेना,
आज भी याद आता है.....
वो हॉस्टल के फ़ोन से गर्ल्स-हॉस्टल फ़ोन लगाना
वो मेस की टीवी पर क्रिकेट मैच देखना और
मेस में स्ट्राइक होने पर मिनाल जाके खाना
आज भी याद आता है.....
वो दीपक का हर बर्थडे पर पिटना,
वो समीर, नितिन, पियूष का हॉस्टल आना और
वार्डन के आने पर नितिन को सेल्फ पर चढ़ाना
आज भी याद आता है.....
वो ब्रिज को '********' पढ़ाना,
वो मिश्रा को '#### ####' दिखाना और
बँटी का कारनामा
आज भी याद आता है.....
वो रात को देर से आना और
वार्डन को 'Election' की बातों में फंसाना,
वो दोस्तों का तराना,
वो हॉस्टल का अफसाना,
वो साल जो था सुहाना,
आज भी याद आता है.....