Wednesday, February 23, 2011

आज भी याद आता है

वो हॉस्टल के हसीं पल
आज भी याद आते हैं ||

वो अविनाश का 'पार्टनर' कहना,
वो राहुल का 'जुल्फें' सवारना और मुस्कुराना,
वो मिश्र की 'झंडू बाम','सोने का स्टाइल' और 24 घंटे पढना,
आज भी याद आता है.....

वो उज्जवल का 'बचपना',
वो विभोर की 'गालियाँ',
वो ललित का 'चिल्लाना' और पचौरी का 'इमेजिनेसन',
आज भी याद आता है.....

वो नितिन का 'कांव' करना,
वो विनायक का 'उठाकर दौड़ना'
वो 317 का 'मीटिंग रूम' और 315 का 'प्रताड़ना कक्ष',
आज भी याद आता है.....

वो शाम ७ बजे गर्ल्स हॉस्टल साइड वाले रूम्स की लाइट बंद कर खिड़कियाँ लूटना,
वो शनिवार की रात भर movies देख कर रविवार को पूरा दिन सोना और
सिर्फ खाने के लिए उठना,
आज भी याद आता है.....

वो पचौरी के साथ हॉस्टल की छत पर BME की तैयारी और
'चप्पल-डांडिया' वाली सभी दोस्तों की यारी,
आज भी याद आती है.....

वो डायरी मेन्टेन करना,
रात 2 बजे रैगिंग देना और
सीनियर्स के रूम्स विसिट करके मिनाल में पार्टी लेना,
आज भी याद आता है.....

वो हॉस्टल के फ़ोन से गर्ल्स-हॉस्टल फ़ोन लगाना
वो मेस की टीवी पर क्रिकेट मैच देखना और
मेस में स्ट्राइक होने पर मिनाल जाके खाना
आज भी याद आता है.....

वो दीपक का हर बर्थडे पर पिटना,
वो समीर, नितिन, पियूष का हॉस्टल आना और
वार्डन के आने पर नितिन को सेल्फ पर चढ़ाना
आज भी याद आता है.....

वो ब्रिज को '********' पढ़ाना,
वो मिश्रा को '#### ####' दिखाना और
बँटी का कारनामा
आज भी याद आता है.....

वो रात को देर से आना और
वार्डन को 'Election' की बातों में फंसाना,
वो दोस्तों का तराना,
वो हॉस्टल का अफसाना,
वो साल जो था सुहाना,
आज भी याद आता है.....

Friday, February 11, 2011

आखिर शुरुआत हो ही गयी.....

       बड़े दिनों के बाद या यूँ कहें कि बहुत महीनों के बाद, आज कुछ लिखने की हिम्मत कर ही ली | हाँ सही पढ़ा आपने... "हिम्मत"...| अपनी कलम से कागज को चिढाना कोई आसान काम नहीं है दोस्त.. बड़ी हिम्मत, बड़ी मेहनत लगती है इस काम को अंजाम तक पहुचाने में | मै पिछले करीब साल भर से लिखने की योजना बना रहा था कि शुरुआत कर ही दूँ, पर हर बार कुछ अडचनों के चलते कागज और कलम की जिरह नहीं हो पा रही थी | लेकिन बड़े दिनों के बाद आज मेरी 'लेखनी' को अपना 'लेखन' मिल पाया है | तो सोचा कि क्यों न आज 'लेखन-लेखनी' के कबाब में पड़ी इन हड्डियों को ही निकल फेंका जाये.... अरे सोचना क्या है फेंक ही डालते हैं आज सबको...|
       सीता-राम, राधे-श्याम (पुरातन काल) से चली आ रही परंपरा आज लैला-मजनू, हीर-राँझा (नूतन काल) तक अनवरत है तो मै क्यूँ इसे तोड़ू | मै भी उसी 'स्त्रीलिंग' से शुरुआत करता हूँ | इन दुश्मनों में सबसे पहले आती है - पहली तारीख
       जब भी कोई काम करना होता है तो अपन पहली तारीख का इंतज़ार करते हैं | ऐसा क्या है 'महीने' की इस बड़ी बेटी के पास जो ये सभी को अपने मोह में बाँध लेती है ? अपनी इस जिज्ञासा को शांत करने के लिए मैं 'महीने' के घर जा पहुंचा | वहां जाकर देखा महीना तो अपनी सभी बेटियों को एक समान प्यार करता है, हम ही उनमें भेद कर लेते हैं | पहली तो वहां थी नहीं, तो मै बारहवीं को लेकर आ गया अपने काम की शुरुआत करने...|
       कभी कभार अपने 'आलस' भाई आकर मना कर देते थे - 'अभी नहीं यार बाद में लिखेंगे'. वो 'लेखनी' से कहता कि मैं इतने दिनों बाद आया हूँ और तुम किसी और से मिलने जा रही हो ; और 'लेखनी' रुक जाती | वो तो एक दिन अच्छा हुआ कि 'लेखनी' को 'आलस' की असलियत पता लग गयी और निकल पड़ी 'लेखनी' अपने 'लेखन' से मिलने...
       एक कारण तो बहुत ही मजेदार है और वो ये कि लेखनी लेखन से तभी मिलेगी जब वो नए कपड़े (नई डायरी) पहन कर आएगा... पर फिर उसे अहसास हुआ कि सुन्दरता आँतरिक होनी चाहिए बहरी नहीं... और आज दोनों मिल ही गए...
       बस यार बहुत हुआ, अब इनकी बातें बंद करता हूँ नहीं तो फिर आ जायेंगे मिलने... | इनके साथ तो अब वही तरीका अपनाऊंगा जो हॉस्टल में कॉलेज न जाने के लिए अपनाता था- अपने कमरे का बाहर से ताला लगवा कर चाबी अन्दर करवा लेना...